राजस्थान की प्रसिद्ध लोक देविया | Goddesses of Rajasthan

1 कैला देवी (करोली) Kaila Devi Temple :

कैला देवी (करोली) Kaila Devi Temple

कैला देवी का मंदिर उत्तर भारत के प्रसिद्ध देवी मंदिरों में से एक माना जाता है। कैला देवी जाट वंश की कुल देवी हैं। राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे विभिन्न राज्यों से जाट लोग यहाँ पूजा के लिए आते हैं। भक्त लाल झंडे लगाते हैं, मंदिर संगमरमर से बना है और इसमें एक बड़ा आंगन है जिसमें चेकर फर्श है। इस मंदिर में डकैत वेश बदलकर आते हैं और माँ कैला देवी की साधना करते हैं। लक्ष्य की पूर्ति हेतु साधना कर माँ से मन्नत मांगते हैं। मन्नत पूरी होने पर फिर आते हैं। माँ को विजय घंटा और ध्वज चढ़ाते हैं और निकल जाते हैं

मंदिर कैला देवी गाँव के बरकत नगर में है। कैला देवी ट्रस्ट हर साल भाद्रपद के महीने में एक लक्खी मेला आयोजित करता है। कैला देवी ट्रस्ट द्वारा दिन-प्रतिदिन की धार्मिक गतिविधियों को नियंत्रित किया जाता है। मंदिर सप्ताह में सभी दिन सुबह 08: 00 बजे से शाम 09: 00 बजे तक खुला रहता है।

2 करणी माता (बीकानेर) Karni Mata Temple :

करणी माता (बीकानेर) Karni Mata Temple

बीकानेर में करणी माता मंदिर 25, 000 से अधिक चूहों के कारण लोकप्रिय है, जो मंदिर परिसर के आसपास रहते हैं और स्वतंत्र रूप से घूमते हैं। इन चूहों को भक्तों के पैरों के ऊपर से गुजरते हुए दीवारों और फर्शों में दरारों से बाहर निकलते हुए देखा जा सकता है। भक्तों द्वारा लाया गया प्रसाद इन चूहों को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है इन चूहों द्वारा खाए गए प्रसाद को भक्तो में बाटा जाता है। गलती से भी चूहे को चोट पहुँचाना या मारना एक गंभीर पाप माना जाता है। इस पाप से मुक्ति के लिए लोग यहाँ सोने से बना चूहा अर्पित करते है। यहाँ आने वाले भक्त और आगंतुक इन चूहों के लिए मिठाई और अन्य प्रसाद भी लाते हैं। सभी चूहों में से, सफेद चूहों को विशेष रूप से पवित्र माना जाता है क्योंकि उन्हें करणी माता और उनके पुत्रों का अवतार माना जाता है।

करणी माता मंदिर से जुड़ी दिलचस्प कथा प्रचलित हैं। इन किंवदंतियों में सबसे प्रचलित करणी माता के सौतेले पुत्र लक्ष्मण की कहानी है। लक्ष्मण एक दिन कोलायत तहसील में कपिल सरोवर से पानी पीने का प्रयास करते समय उसमें डूब जाते हैं। इस घटना से दुखी, करणी माता मृत्यु के देवता यम से अपने पुत्र को जीवित करने की प्रार्थना करती है, लेकिन यम अनुरोध को अस्वीकार कर देते है। हालाँकि, बाद में माता के दुःख से विचलित हो यम देवता, उसकी याचना को स्वीकार कर लेते है और न केवल लक्ष्मण बल्कि करणी माता के सभी नर बच्चों को चूहों के रूप में पुनर्जन्म देते है।

करणी माता बीकानेर राजघराने की कुलदेवी है। करणी माता मंदिर का निर्माण बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह द्वारा संपन्न किया गया था। संगमरमर से बना ये मंदिर वास्तुकला मुगल शैली से मिलती जुलती है। आकर्षक संगमरमर के अग्रभाग के आकर्षण में ठोस चांदी के दरवाजे हैं चांदी के दरवाजों के पैनल देवी की कई किंवदंतियों को दर्शाते हैं। माता की विराजमान मूर्ति मंदिर के आंतरिक गर्भगृह के भीतर है, मुकुट और माला से सुशोभित माता यहाँ एक हाथ में त्रिशूल (त्रिशूल) धारण की हुई है। करणी माता मंदिर में नियमित रूप से पुजारियों द्वारा मंगला-की-आरती और भोग प्रसाद का प्रदर्शन शामिल है। मंदिर में आने वाले भक्त देवी और कब्बास (चूहों) को विभिन्न प्रसाद भी चढ़ाते हैं।
यह मंदिर राजस्थान के बिकनेर जिले में स्थित है। इन मेलों के लगने का समय दो नवरात्रों के दौरान होता है-मार्च से अप्रैल के बीच चैत्र शुक्ल एकम् से चैत्र शुक्ल दशमी तक और सितंबर से अक्टूबर के बीच अश्विन शुक्ल से अश्विन शुक्ल दशमी तक मेला लगता है। करणी माता मंदिर सुबह 4 बजे से रात 10 बजे तक खुला रहता है।


3 जीण माता (सीकर) Jeen Mata Temple :

जीण माता (सीकर) Jeen Mata Temple

अनुमानित है कि यह मंदिर करीब 900 साल पुराना मंदिर है। जीणा माता का वास्तविक नाम जयंती माता है। ऐसा कहा जाता है कि जीण माता की इस मंदिर को तुड़वाने के लिए औरंगजेब ने सैनिक भेजे थे देवी की महिमा अपरम्पार है उन्होंने मधुमक्खियों के रूप में आकर मंदिर की रक्षा थी। ऐसा होते देख गाँव वालो की माता के प्रति विश्वास और अधिक बढ़ गया और औरंगजेब अपने कार्यों में विफल हो गया। एक बार जब औरंगजेब बीमार पड़ा तो उसे उसी समय अपनी गलती का एहसास हुआ और जीण माता के मंदिर में हर महीने सवा मन तेल चढ़ाने का वचन दिया।

जब उसने माफी मांगी और माता ने उसे माफ कर दिया। उसी दिन से मुगल बादशाह को माता के प्रति श्रद्धा बढ़ गई, इस मंदिर में जीण माता के दर्शन करने लोग बाहर से भी आते है। यहाँ नवरात्रि के समय में नौ दिन मेला लगता है और लोग बड़ी धूम-धाम से माता की पूजा करते हैं। यह मंदिर राजस्थान के सीकर जिले के घांघू गाँव में स्थित है।

4 शिला देवी (जयपुर) Shila Mata Mandir :

शिला देवी (जयपुर) Shila Mata Mandir

सोलहवीं शताब्दी के अंत में प्रतापादित्य के राज्य में, महाराजा मानसिंह को राजा केदार के हाथों हार मिली। अपमानित और उदास, महाराजा ने देवी काली की आराधना का प्रण लिया और उन्हें प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनकी हार को जीत में बदलने के लिए पूजा की। उसे आशीर्वाद देने के लिए काली स्वप्न में प्रकट हुई। देवी को महाराजा से एक वादा भी मिला था कि वह उनकी राजधानी में उनका मंदिर स्थापित करेंगे। महाराजा मानसिंह बंगाल के पूर्वी भाग से देवी शिला माता की मूर्ति लाए। देवी की मूर्ति को शिला के रूप में समुद्र से बरामद किया गया था और इसे साफ कर उन्होंने इस मूर्ति की स्थापना अपने नगर की राजधानी में स्थापित करवाई। यह मंदिर जयपुर से 10 की मी की दूरी पर सांगानेर में स्थित है


5 त्रिपुर सुंदरी (बांसवाड़ा) Tripura Sundari :

त्रिपुर सुंदरी (बांसवाड़ा) Tripura Sundari

त्रिपुर सुंदरी की मूर्ति आठ भुजाओं वाली है। पांच फीट ऊंची इस प्रतिमा में माँ की अष्टदश भुजाओं में विभिन्न शस्त्र हैं। किनारे पर नवदुर्गा की प्रतिकृतियाँ खुदी हुई हैं।

इस क्षेत्र में विक्रम संवत 1540 का एक शिलालेख मिला है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह मंदिर सम्राट कनिष्क काल का है। गुजरात के सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह की यह इष्ट देवी रही। माँ की उपासना के बाद ही वे युद्ध प्रारंभ करते थे। कहा जाता है कि मालवा नरेश जगदीश परमार ने अपनी माता के चरणों में अपना सिर काट दिया था वहीं राजा सिद्धराज की प्रार्थना पर माता ने पुत्र जगदेव को जीवित कर दिया।

मंदिर का जीर्णोद्धार तीसरी शताब्दी के आस-पास पांचाल जाति के चांदा भाई ने करवाया था। मंदिर के समीप ही भागी खदान है, जहाँ किसी समय लोहे की खदान हुआ करती थी। किंवदंती के अनुसार एक दिन त्रिपुरा सुंदरी भिखारिन के रूप में खदान के द्वार पर पहुँची, किन्तु पांचालों ने उस तरफ ध्यान नहीं दिया। देवी ने क्रोधवश खदान ध्वस्त कर दी। इस मंदिर का जीर्णोद्धार 16वीं शताब्दी में किया गया था। त्रिपुरा सुंदरी मंदिर की देखरेख आज भी पांचाल समाज करता है।

राजस्थान में बांसवाड़ा से लगभग 14 किलोमीटर दूर तलवाड़ा ग्राम से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर उमराई के छोटे से ग्राम में माँ त्रिपुरा सुंदरी प्रतिष्ठित है

6 तनोत माता (जैसलमेर) Tanot Mata :

तनोत माता (जैसलमेर) Tanot Mata

चारण साहित्य के अनुसार तनोट माता दिव्य देवी हिंगलाज माता का अवतार है। बहुत समय पहले ममदिया चारण नाम का एक आदमी था, जिसके कोई संतान नहीं थी, उसने संतान प्राप्ति के लिए लगभग सात बार पैदल ही पूरी तरह से हिंगलाज माता की यात्रा की। एक रात, जब हिंगलाज माता ने सपने में उस ममड़िया चारण से पूछा कि आपको बेटा चाहिए या बेटी, तो चरण ने कहा कि आप मेरे घर जन्म लें। हिंगलाज माता की कृपा से उस घर में सात पुत्रियों और एक पुत्र का जन्म हुआ। इन्हीं में से एक थी अवद माता, जिन्हें तनोट माता के नाम से जाना जाता है। उस समय के शासक भाटी राजपूत राजा तनु राव ने 828 ईस्वी में उनके मंदिर की स्थापित किया था।

तनोट माता मंदिर का एक एसा चमत्कार भी है जिसके चमत्कार के सामने पाकिस्तानी फ़ौज को भी नतमस्तक होना पड़ा। भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 के युद्ध में सीमा के दूसरी ओर से आतंकवादी तनोट गाँव को निशाना बनाकर बम बरसा रहे थे। हालांकि, इस तथ्य के बावजूद कि 1000 से अधिक बम लॉन्च किए गए, उनमें से कोई भी तनोट माता मंदिर के आसपास के क्षेत्र में नहीं फटा।
यह 1965 से 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों के दौरान इस्तेमाल किए गए हथियारों और गोला-बारूद को संरक्षित किया गया है। । बीएसएफ ने मंदिर के पास एक संग्रहालय भी स्थापित किया है जो भारतीय सेना से जुड़े इस मंदिर की महिमा को बयाँ करता है। यह मंदिर जैसलमेर से 153 किलोमीटर दूर है। जैसलमेर से मंदिर तक पहुँचने में करीब 2 घंटे का समय लगता है। शहर से मंदिर के लिए कई टैक्सियाँ ​​उपलब्ध हैं।


7 इडाणा माता (उदयपुर) Idana Mata Temple :

इडाणा माता (उदयपुर) Idana Mata Temple

यहाँ इडाणा देवी की प्रतिमा माह में दो से तीन बार स्वतः जागृत अग्नि से स्नान करती है। इस अग्नि स्नान से माँ की सम्पूर्ण चढ़ाई गयी चुनरियाँ, धागे आदि भस्म हो जाते हैं। इसी अग्नि स्नान के करण यहाँ माँ का मंदिर नहीं बनाया गया है, माँ का दरबार बिलकुल खुले एक चौक में स्थित है। माँ की प्रतिमा के पीछे अगणित त्रिशूल लगे हुए है। यहाँ भक्त अपनी मन्नत पूर्ण होने पर त्रिशूल चढाने आते है। पुत्र प्राप्ति की मन्नत पूर्ण होने पर यहाँ झुला चढाने की भी परम्परा है। इस मंदिर में भक्तों द्वारा माँ को मुर्गे भी भेंट किये जाते हैं लेकिन यहाँ किसी जानवर की बलि नहीं चढ़ाई जाती हैमाता के मंदिर में लकवे का इलाज भी होता है। जो भी लकवा ग्रस्त यहाँ आता है, कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो जाता है

यह मंदिर बहुत ही चमत्कारी है जिसका रहस्य आज तक कोई जान नहीं पाया है यह मंदिर राजस्थान के उदयपुर शहर से 60 कि।मी। दूर कुराबड-बम्बोरा मार्ग पर अरावली की विस्तृत पहाड़ियों के बीच स्थित है।


8 अवारी माता (चित्तौड़गढ) Avari Mata temple :

अवारी माता (चित्तौड़गढ) Avari Mata temple

प्रचलित किवंदितियो के अनुसार भदेसर गाँव में एक जमींदार था जिसका नाम आवाजी था। आवाजी के सात पुत्र व एक पुत्री थी। आवाजी ने अपने पुत्रो से अपनी पुत्री केसर के लिए सुयोग्य वर ढूँढने को कहा। सातों भाईयों ने अलग-अलग जगह विवाह तय कर दिया। केसर ने अपनी कुल देवी की आराधना की और इस समस्या का समाधान करने का आग्रह किया। विवाह के दिन धरती फटी केसर उसमें समा गई। पुत्री को धरती में समाते हुए पिता ने अपनी पुत्री का पल्लू पकड लिया। इससें नाराज केसर ने अपने पिता को श्राप दे दिया था। आवाजी ने इस श्राप से मुक्ति के लिए मंदिर का निर्माण करवाया जो आज अवारी माता के नाम से जाना जाता है।

इस मंदिर में पोलिया जेसे अन्य कई प्रकार के रोगी मंदिर में देवी की पूजा अर्चना करने से ठीक हो जाते है और शरीर का जो अंग बीमारी से ठीक होता है उस अंग के जैसा सोने व चांदी का अंग बनाकर माता का अर्पण किया जाता है।

यह मंदिर राजस्थान के चित्तौड़गढ से 40 किलोमीटर की दूरी पर आसारावा गाँव में स्थित है।


9 आशापुरा माता (नाड़ोल, पाली) Ashapura Mata :


आशापुरा माता चौहान वंश की कुलदेवी है। यह प्रसिद्ध मंदिर राजस्थान के नाडोल शहर में है जो की-की देसूरी तहसील का एक नगर है, पाली जिले में स्थित है। यहाँ स्थित आशापुरा माता के मंदिर में देशभर से श्रद्धालु आते हैं। लक्ष्मण शाकंभरी चरणमान नाडोल शहर के संस्थापक थे। उन्होंने 10 वीं-12 वीं शताब्दी के दौरान नाडोल शहर में इस रियासत की नक्काशी की।

उनसे सम्बंदित एक कहानी प्रचलित है जब लक्ष्मण उस नगर का रक्षक था एक रत जब लक्ष्मण हमेशा की तरह अपनी नियमित गश्त पर था। नगर की परिक्रमा करते-करते लक्ष्मण को प्यास लगी जब प्यास बुझाने हेतु नगर के बाहर समीप ही बहने वाली भारमली नदी के तट पर जा पहुँचा। पानी पीने के बाद नदी किनारे बसी चरवाहों की बस्ती पर जैसे लक्ष्मण ने अपनी सतर्क नजर डाली, तब एक झोंपड़ी पर हीरों के चमकते प्रकाश ने आकर्षित किया। वह तुरंत झोंपड़ी के पास पहुँचा और वहाँ रह रहे चरवाहे को बुला प्रकाशित हीरों का राज पूछा। चरवाह भी प्रकाश देख अचंभित हुआ और झोंपड़ी पर रखा वस्त्र उतारा। वस्त्र में हीरे चिपके देख चरवाह के आश्चर्य की सीमा नहीं रही, उसे समझ ही नहीं आया कि जिस वस्त्र को उसने झोपड़ी पर डाला था, उस पर तो जौ के दाने चिपके थे।

लक्ष्मण द्वारा पूछने पर चरवाहे ने बताया कि वह पहाड़ी की कन्दरा में रहने वाली एक वृद्ध महिला की गाय चराता है। आज उस महिला ने गाय चराने की मजदूरी के रूप में उसे जो कुछ दिए थे। जिसे वह बनिये को दे आया, कुछ इसके चिपक गए, जो हीरे बन गये। लक्ष्मण उसे लेकर बनिए के पास गया और बनिए ने बरामद हीरे वापस ग्वाले को दे दिये। लक्ष्मण इस चमत्कार से विस्मृत था अतः उसने ग्वाले से कहा- अभी तो तुम जाओ, लेकिन कल सुबह ही मुझे उस कन्दरा का रास्ता बताना जहाँ वृद्ध महिला रहती है। 

दुसरे दिन लक्ष्मण जैसे ही ग्वाले को लेकर कन्दरा में गया, कन्दरा के आगे समतल भूमि पर उनकी और पीठ किये वृद्ध महिला गाय का दूध निकाल रही थी। उसने बिना देखे लक्ष्मण को पुकारा- लक्ष्मण, राव लक्ष्मण गये बेटा, आओ। आवाज सुनते ही लक्ष्मण आश्चर्यचकित हो गया और उसका शरीर एक अद्भुत प्रकाश से नहा उठा। उसे तुरंत आभास हो गया कि यह वृद्ध महिला कोई और नहीं, उसकी कुलदेवी माँ शाकम्भरी ही है। और लक्ष्मण सीधा माँ के चरणों में गिरने लगा, तभी आवाज आई- मेरे लिए क्या लाये हो बेटा? बोलो मेरे लिए क्या लाये हो?

लक्ष्मण को माँ का मर्मभरा उलाहना समझते देर नहीं लगी और उसने तुरंत साथ आये ग्वाला का सिर काट माँ के चरणों में अर्पित कर दिया। लक्ष्मण द्वारा प्रस्तुत इस अनोखे उपहार से माँ ने खुश होकर लक्ष्मण से वर मांगने को कहा। लक्ष्मण ने माँ से कहा- माँ आपने मुझे राव संबोधित किया है, अतः मुझे राव (शासक) बना दो ताकि मैं दुष्टों को दंड देकर प्रजा का पालन करूँ, मेरी जब इच्छा हो आपके दर्शन कर सकूं और इस ग्वाले को पुनर्जीवित कर देने की कृपा करें। वृद्ध महिला तथास्तुकह कर अंतर्ध्यान हो गई। इसके बाद लक्ष्मण नाडोल शहर की सुरक्षा में तन्मयता से लगा रहा। 


10 भुवाल माता-माता मंदिर (नागौर) Bhuwal Mata :

भुवाल माता-माता मंदिर (नागौर) Bhuwal Mata

यहाँ देवी को ढाई प्याला शराब चढ़ाई जाती है। माता को चांदी के प्याले में शराब का भोग लगाया जाता है। देवी के मुंह से शराब से भरा चांदी का प्याला लगाते ही शराब गायब हो जाती है, प्याले को  दो बार पूरी तरह भरकर देवी को शराब अर्पित की जाती है और तीसरी बार प्याला आधा भरा जाता है। कहते हैं माता ढाई प्याला शराब ही ग्रहण करती हैं।

यहाँ माता काली ब्राह्मणी दो स्वरूप में पूजी जाती हैं। काली को शराब और ब्राह्मणी को मिठाई का भोग लगाया जाता है माता एक खेजड़ी के पेड़ के नीचे पृथ्वी से स्वयं प्रकट हुई थीं। इस स्थान पर डाकुओं के एक दल को राजा कि फौज ने घेर लिया था। मृत्यु को निकट देखकर उन्होंने माँ को याद किया माँ ने अपनी शक्ति से डाकूओं को भेड़-बकरी के झुंड में बदल दिया और उनकी जान बच गई। डाकूओं ने लूट के माल से मंदिर का निर्माण करवाया।

राजस्थान की प्रसिद्ध लोक देविया | Goddesses of Rajasthan राजस्थान की प्रसिद्ध लोक देविया | Goddesses of Rajasthan Reviewed by Bharat Darshan on सितंबर 02, 2021 Rating: 5

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